Saturday, 24 December 2011

कहा गये वो दिन दिवाली के ????
 
 ज जब वो दिन याद करती हू तो लगता है की जैसे हम अपने पीछें कितने ऐसे लम्हों यादों को पीछें छोंड़ आये है जो हमारे लिए कितने खास थे और उस समय हमें उनकी कद्र नहीं थी या कभी हमनें की नहीं। जब हम कल में जी रहे थे तो हम बेहतर आज की तैयारी में लगे हुए थे पर जब आज को देखते है तो लगता है की इस आज से वो कल ही बेहतर था।
आज भी वो दिन मुझे याद है जब नवम्बर आते ही घरों में चहल–पहल शुरू  हो जाया करती थी और हमें भी अंदाजा हो जाता था कि दिवाली आने को हैं। कितना अजीब लगता है आज जब हमें महीनें भर पहलें ही पता होता हैं कि दिवाली कब है फिर भी कोइ नया एहसास मन में नही आता। नवम्बर का महीना आते ही दस्तक दे जाता था और मानों चुपके से कह रहा हो मै आ गया हू और अपनी ठण्ड़ी . ठण्ड़ी हवाओं से हमारे
रीर को छुता और कहता मै आ गया हू पर आज मानों साल पे ंसाल गुजर जाते है और पता ही नहीं चलता। मानों नवम्बर कहता कि मैं अकेला नहीं आया हू साथ में दिवाली भी ले कर आया हू  बाट लो ख़ुशी जितनी बाटना चाहते हों जोड़ लो उन टूटे दिलों को जिन्हें जोड़ना चाहते हो मैं तुम्हारे साथ हू । दिवाली आने से कई  दिनोें पहले ही घरों, दुकानाें,बाजारों में चहल -पहल शुरू  हो जाया करती और एक अजीब सी रौनक छा जाती , हमारे चहरों की मुस्कान की लकीरें और लम्बी हो जाती मानो ऐसा लगता की घर में कोई  बड़ा काम होने वाला हो और वो लम्बी -लम्बी छुट्टिया  याद है न वो कैसे भूल सकते है घर के वो सभी लोग चाहे छोटे हो या बड़े सब मिलकर साफ-सफाई  में ऐसे लग जाते मानो वो एक दिन में ही अपने घर को चमका कर एकदम महल से बना देगे, साथ-साथ सुबह से लेकर शाम  तक सभी घरवालों के साथ हर छोटे-मोटे कामों में हाथ बटाना , सजावट से लेकर पकवान तक, खरीदारी से लेकर परिधान तक सब काम इतनी आसानी से कब पूरे हो जाते थें कुछ पता तक नहीं चलता था। पर आज कामों की संख्या कम है सबकी जगह नयी नयी तकनीकों ने ली है फिर भी वक्त रहतें वो काम पूरें नहीं हो पाते शायद
इसका कारण यह भी है कि पहले ये सब तैयारी,काम  शायद अपने ख़ुशी  के लिए करते थे पर आज दूसरों को दिखाने के लिए करते है। पहले हम कम संसाधनों में भी जी भर कर खुशिया  बटोर लिया करते थें पर आज इतने ज्यादा संसाधनों में भी एक छोटी सी ख़ुशी  तक नहीं ढूढ़ पाते है। दिवाली तो जो कल थी वो आज भी है बदली वो नही बदला तो समय है जिसने दीये की जगह कैंडल को और कैंडल ने वो जगह बल्बों को दे दी हैं। बदलाव तो होना जरूरी है आखिरकार यह प्रकृति का नियम हैंं। और अगर किसीकी जरूरत है तो हमारे विशवासो के ठहराव की । त्यौहार कोई  भी हो सबका मकसद  ख़ुशी बांटना होता है, आपस में प्यार बांटना होता है , रोते को हसाना होता है तो  सभी गीले शिकवे  दूर कर के त्यौहार मानाये ़पर साथ ही आने वाले कल की बजह आज को जी भी जीयेंं।

"शायद हम बेहतर आज की तमन्ना में अपने वो हसीन,रंगीन पल वो कल कही बहुत पीछें छोड़ आये है और
शयद यही इस दुनिया की रीत है कि कुछ पाने के लिए बहुत कुछ खोना पड़ता है तो पहले हम ये कोशिश करे कि पहले हम अपना आज बेहतर बनाये।"

















































































 

Sunday, 2 October 2011

आज इस जिन्दगी को एक नए तरीके से देखने की एक नई सुरुवात  की है /
आशा है आप  इस नए नजर्रिये का   तहे दिल  से स्वागत करेगे ...........................................................................