Sunday, 8 January 2012

माँ की पहचान

            माँ की पहचान
खुदा ने पूछा मुझसे 
ऐसा तेरे पास क्या है ? 
जिसपे तू इतना घमंड करता है ......
मैंने कहा वो .......वो ...........मेरी माँ  है ,
ऐसे आश्चर्य से देखते हुए खुदा ने कहा ??
माँ ....?.........?  
तो बता कैसी है तेरी माँ .........?

मैंने कहा मेरी माँ तो बिल्कुल माँ के जैसी है .....!
इस जहा के दुख भरे अंगारे ,
जब इस शरीर को जालाने लगते है ........
तब जो अपने ममतामयी से छाव करती है ....वो ...ही ....है ....मेरी माँ.....!.

हिम्मत के पुल जब टूटने लगते है ,
और आसुओ के झरने बेवजह ही बहने लगते है ......
तो सबसे पहले जो अपने हाथ हमारे सर पर 
प्यार से फेरती है .....वो .....ही .....है ...मेरी माँ ......!
 
जब जब मिलती थी उसे 
उसके हक़ की एक रोटी,
उसमे भी वो चार हिस्से कर दे देती थी हमे .........
जो खुद भूखे रहकर हमे 
भरपेट सुलाती थी ....वो......ही....है....मेरी माँ .......!

पल में रूठी पल में मान जाती है .,
कभी हँसते-हँसते रुलाती तो ,
कभी रोते -रोते हँसा जाती है ..
है गंगा जैसी पवित्रता जिसमे
ममता रही सदा सागर सी गहरी ,
अगर कभी बने मुजरिम उसकी आदालत में 
तो सजा रही बा-इज्ज़त बरी 
जो बिना कहे भी बहुत कुछ कह जाती है
...वो......ही....है.....मेरी माँ ........!

"ये खुदा तू पहुँच नहीं सकता न सबके पास ......
  तभी तो आज ...माँ... है हमारे पास ....."




Tuesday, 3 January 2012

बेरंग बचपन

                                            बेरंग बचपन 
जब बैठती हू अकेले में तो एक मंजर याद  आता है,
वह मंजर ही था या ...........सच ये समझ नहीं  आता है |
अगर ये सच है ... तो शर्मसार है मानवता  ,
है एक मानव और जानवर में भी फर्क ...
तो ये फर्क समझ नहीं आता है |




देखा था मैंने दो बच्चो को आपस में लड़ते हुए ,
इस मायूस जिन्दगी में अपनी हंसी से रंग भरते हुए |
न तो थे बदन पे कपड़े और न ही था सर पर किसी का हाथ ,
फिर भी चल पड़े थे इस अंजान दुनिया में एक - दूजे के साथ |
बच्चे तो होते है खुदा का रूप ... न होती है उनमे कोई खोट ,
उन्हें न पता था की ये जालिम दुनिया देगी उन्हें हर कदम पर एक चोट |
"क्यों गरीबी होती है इतना बड़ा अभिशाप ,
तो ये अभिशाप समझ नहीं आता है |"
है एक मानव और जानवर में भी फर्क ...
तो ये फर्क समझ नहीं आता है |

जिस उम्र में होने चाहिए थे उनके हाथो में खिलौने ,
फिर किसने छीन लिए उनके ये सुंदर सपने सलौने | 
कोई छोड़ देता है इन्हें मंदिरों की सिढियो पर , 
तो कोई फेंक देता है अपनी बदनसीबी समझकर |
"क्यों कोई समझता ही नही ये है इश्वेर का ही अंश ,
ये सच समझ नहीं आता है |"

है एक मानव और जानवर में भी फर्क ...
तो ये फर्क समझ नहीं आता है |

चाहते है वो हमसे बस कुछ  प्यारी सी मीठी सी पुचकारिया, 
बदले में फिर क्यों देते है हम उन्हें सिर्फ गालिया ही गालिया |
हर भाषण में एक नेता एक वक्ता ये कहता है ........
बाल मजदूरी है अपराध इसे रोको |
"फिर क्यों उन्ही के घरो में मिल जाते है 
अक्सर ये बदनसीब ,ये सच समझ नहीं आता है "
है एक मानव और जानवर में भी फर्क ...
तो ये फर्क समझ नहीं आता है |
              
 आखिर क्यों?  हम इस जिन्दगी में दोहरे रूप रखते है
 एक पल देवता तो दूजे पल हैवान  क्यों  बनते है ?

"ऐसा भी होता है परिवर्तन तो यह परिवर्तन समझ नै आता है |"
 
है एक मानव और जानवर में भी फर्क ...
तो ये फर्क समझ नहीं आता है |
 ये भी है किसी बगिया की कालिया 
                 इन्हें फूल बन्ने से पहले मत तोड़ो ,
यही है हमारे देश का भविष्य 
                 इन्हें अंधकार में तो मत धकेलो|