बचपन के खेल : कुछ इस तरह याद आये
"आज बचपन के खेल कुछ इस तरह याद आये , जब टूटे हुए खिलौने कबाड़ो में नज़र आये " हाय ......................... वो बचपन के दिन भी क्या दिन थे , चाहत चाँद को पाने की करते थे और दोपहर से शाम तक कभी बुलबुल कभी तितली को पकड़ा करते . न दिन का होश न शाम की खबर न ही सुध - बुध कपड़ो की और न ही अपनी . कभी मिट्टी पे हम तो कभी मिट्टी हमारे चेहरों को छूती ,कभी हाथो पे तो कभी कपड़ो पे याद है न कैसे लग जाया करती थी . सुबह की वो प्यारी मीठी नींद से जब हमे जबरदस्ती जगाया जाता .. वो भी स्कूल जाने के लिए. कितना गुस्सा आता था न .......थक - हार के स्कूल से आते पर तुरंत ही खेलने के...