Wednesday, 28 November 2012

लत अख़बार की



? आपने कई तरह की लत के बारे में सुना है पर क्या अख़बार पढ़ने की लत के बारे में कभी सुना है
                                                                 




मीडिया का सबसे सशक्त हथियार आज भी अख़बार हैं. ये कागज पर शब्दों से बने वाक्यों को लिख कर या छाप कर तैयार किया जाता है. इसकी बढ़ती लोकप्रियता के पीछे उसकी पैकेजिंग नहीं है, बल्कि पाठकों की रूचि हैं. आज जहाँ इलेक्ट्रौनिक व वेब मीडिया का बोलबाला है, वही ये सस्ता व छोटा माध्यम इन सबसे आगे है. जाहिर है कि हर व्यक्ति अपने आस - पड़ोस की ख़बर को ज्यादा अहमियत देगा न  की दूर - दराज देशों में  घट रही सूचनाओं को. जहाँ तक आंकड़े गलत नहीं हैं तो ज्यादातर लोगों की रूचि अपने आस - पास क्या हो रहा है और क्या होने वाला है, ये जानने में होती है, जो कि न्यूज चैनल व वेब पोर्टल नहीं दे सकते हैं लेकिन इसमें आपको पन्ने पलटते ही अपने आस - पड़ोस, देश - विदेश, खेलकूद, सिनेमा, विज्ञापन और ढ़ेर सारी  ख़बरें देखने और जानने को मिलेगी.

हम सबने अपने घरों व आस - पास एक आदत तो जरूर नोटिस की होगी, सुबह की चाय और अख़बार. जिस दिन टाइम पर हॉकर  पेपर न डाल जाये फिर तो उसकी शामत ही समझिए, वृद्धा - अवस्था से गुजर रहे लोगों का टाइम पास बन जाता है ये और कभी लम्बी यात्राओं का हमसफर, किसी के लिए जरूरत तो किसी के लिए डेली अपडेट की किताब बन जाता है और जब ये हमारी दैनिक आदतों से जुड़ता है तो 'लत' बन जाता है एक ऐसी लत जो दवा - दारू दोनों का ही काम करती है.

अख़बार को ज्यादातर लोगों ने अपनी जिंदगी के अहम हिस्से में साथी माना है, और उनकी इस कमी को कोई  अन्य मीडियम पूरा नहीं कर सकता, अपनी आदत में शामिल कर चुके डी.ए.वी. कॉलेज  के प्रवक्ता डा मणीन्द. ª तिवारी बताते है कि ''अख़बार मेरी दिनचर्या का एक अहम हिस्सा है जिस दिन नहीं आता है उस दिन मैं पुराना अख़बार ही पढ़ लेता हूँ , पर पढ़ता जरूर हूँ ''. वास्तविकता भी यही कहती है कि आज मीडिया के विस्तार में सहयोग अख़बार का ज्यादा है. दैनिक जागरण के संवाद्दाता, पारितोष का मिश्र कहना है की, "सुबह से शाम तक अखबारों के ही बीच में रहता हूँ ,पर  अपने निजी समय से कुछ वक्त निकालकर अख़बार जरूर पढ़ लेताहूँ  चाहे आप इसे लत ही क्यों न  कहें". ये हाल सिर्फ एक या दो लोगों का नहीं हैं बल्कि आम - जनमानस का भी  है. रिटायर्ड  अध्यापिका विद्या देवी कहती है, "खाली समय में कोई काम आये या न  आये पर मेरा अख़बार जरूर काम आता है और मेरी लत बस इतनी ही नहीं बल्कि इससे भी अधिक है क्योंकि मुझे एक नहीं कम से कम तीन अख़बार रोज पढ़ने के लिए चाहिए" . अपना अधिकतर समय यात्राओं व होटलों में व्यतीत करनें वाले तोषाली रिजोर्ट  के रीजनल मैनेजर आशीष चतुर्वेदी बताते हैं  "मुझे अपडेट रहने के लिए अख़बार पढ़ना जरूरी हैं, और मुझे हर कीमत पर सुबह की चाय के साथ न्यूज पेपर चाहिए ही चाहिए.
वैसे घबरानें की जरूरत नहीं है इस लत को बीमारी नही दवा कहते हैं जो अच्छी - अच्छी बीमारियों को दूर कर देती है. कुछ लोगों की ये आदत दूसरों को देख कर लगती है तो कुछ की अपने ही आप ही और अख़बार पसंद करने वाले लोग इसकी अहमियत को कम कभी नहीं होने देना चाहेंगें, क्योंकि उनके लिए और हम सब के लिए अख़बार का दर्जा  जो कल था वो आज भी और आने वाले कल में भी होगा, एक कहावत है की  
", जंहा  सुई का काम होता है वंहा  तलवार काम नहीं आती''


अर्चना चतुर्वेदी

Friday, 5 October 2012

पहचान

पहचान 


हते हैं जिन्दगी जब सिखाती  हैं तो अच्छा ही सीखती है .........पर उनका क्या जो हर दिन जिन्दगी से लड़ के जीते हैं . सीखना तो दूर की बात हो गई यहाँ तो कई लोग मरने के लिए भी जंग लड़ते हैं . हर दिन , हर लम्हा और हर पल सिर्फ और सिर्फ हम में से कई का ये सोचते हुए बीत जाता हैं की क्या करे  और क्या न करे ? घर वालो की सुने या दोस्तों की , रिश्तेदारों की सुने या चाहने वालो की । इन सबकी आवाजो में खुद की आवाज़ सुनाई  ही नहीं देती की हम क्या चाहते  हैं अपने बारे में। कभी चुप रहे तो दुनिया वालो ने समझा कमज़ोर हैं हम , जब हँसे तो कहा बेशर्म हैं हम . जब इश्वेर के बनाये गये इंसान से प्यार किया तो कहा पागल हैं हम और जब उसी से नफरत की तो कहा बेदर्द हैं हम ,जीवन की हर कसौटी ने  हमे परखा पर कभी समझा नहीं शायद यही वजह हैं जो आज तक हम अपने को समझ ही नहीं पाए हैं की आखिर क्या हैं हम  ?


असफलताओ से थक  हार कर जब हमने सोचा  बस अब और नहीं ..अब नहीं बढ़ सकता अब मैं और नहीं चल सकता , कब तक और रोऊंगा और कब तक छुपाऊ अपनी कमजोरी को किस से  बताऊ की  मुझे बस एक मौका चाहिए अपने को साबित करने का पर मुझे दुत्कार मिली एक नहीं कई बार मिली । माँ ने कहा तू तो मेरा लाल हैं बड़ा होशियार हैं जा अपनी पहचान बना , पर माँ तुझे कैसे बताऊ की यहाँ पहचान सिर्फ चेहरे की हैं और वो भी चमकदार जो लिपा पुता हो फरेब के नकाब से जो बोलता हो सिर्फ सिखाई हुई भाषा और एक शरीर हो जो ढाका हो कीमती लिवाजो से। इन सबके सामने मेरा हुनर छुप जाता हैं और फिर वही एक सवाल सामने आ  जाता हैं क्या करू मैं ?   

मजेदार बात तो देखो ये दुनिया जीने भी नहीं देती हैं और चैन से मरने भी नहीं देती . और तो और हम करना कुछ और चाहते हैं तो उसमे हमारी परछाई  तक साथ नहीं देती . बांध लेती हैं हमें , जकड लेती हैं ....उन्ही अपनों के  लिए जिनके लिए हम अपनी पहचान बनाने  निकले थे ।




(अर्चना चतुर्वेदी )

Sunday, 10 June 2012

क्या करू ?

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कोई तो बताये मुझे मै क्या करू ?
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रम जाऊ इन लड़कपन के दिनों में
या ,
बचपन के सुनहरे पल याद करू ?


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चेहरे पे नकली हंसी सजाऊ
या ,
वो मासूम खिलखिलाहट याद करू ?




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कोई तो बताये मुझे मै क्या करू ?
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मान लू मै दुनिया के हर फैसले
या,
उन पर बेबाक सवाल करू ?


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रिश्ते निभाऊ
या,
रिश्ते निभाने वालो  से प्यार करू ?




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कोई तो बताये मुझे मै क्या करू ?
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बातो की बात बनाऊ
या,
खुल के इज़हार करू ?


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किसी की तरह बनने की चाहत करू
या,
अपनी चाहतो का मुकाम बनाऊ ?




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कोई तो बताये मुझे मै क्या करू ?
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दुसरो की ख़ुशी के लिए उनकी सुनू ..
या,
अपनी ख़ुशी के लिए अपनी  सुनू ?


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जवाब बनू  या सवाल बनू   ?
सब्र बनू  या कब्र बनू  ?
इंसान बनू  या  भगवान बनू ?
आम बनू  या  महान बनू ?


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बड़ते जाते हैं सवाल , कुछ ही के मिल पाते हैं जवाब
फिर समझोते की समस्या खड़ी  हो जाती हैं की ,

किन सवालों को छुपाऊ ,
किन सवालों को पेश करू ?




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कोई तो बताये मुझे मै क्या करू ?
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                                                    (अर्चना चतुर्वेदी )

Friday, 18 May 2012

मेरी डायरी की शायरी

मेरी डायरी की शायरी
 
( मेरी डायरी में से पेश हैं कुछ  शायरी की  झलकिया .......)


1 . कोई कहता है कैसी
अनसुलझी किताब हु मैं .....
और ...!
कोई पढ़ लेता हैं यूँ
जैसे  कोई खुली किताब हु मैं ...





2 . "भरती हूँ उन तमाम रंगों को रोजाना
तेरे दामन में ....
ए जिन्दगी ............
न जाने किस रंग की तलाश में तू ,
उदास है अब तक ....."




3 . "ये कैसी कश्मोकश है
तेरे मेरे दरमिया..........
इकरार भी ...है
इनकार भी ....है
फिर कहते हो कभी
की......
हमे तुमसे प्यार भी है ।"



4 . " हाय ये तेरी नजरो का पैनापन
इतनी गहराई समाई है इनमे
की अब तो तैरने से भी डर लगता है ....."





5 . "जाने किस बात की सज़ा दी उन्होंने हमे .............
पहले कुछ न कह कर भी रुलाते रहे .......
और आज ......
इतना कुछ कह कर भी रुला दिया ....."





6 . "हमने...उन्हें ,
कभी लोगो से बचाया ,
कभी जमाने से छुपाया ...
कमबख्त .....
दीदार इतना जिद्दी था उनका ,
की हमारी ही नजरो से न बच पाया ........"





7 . "डरते थे हम.....जिस अंजाम के डर से ....
आज जाने क्या हुआ ऐसा
की डर भी न लगा .....
और एक अनजान
अंजाम हो गया ..........."







 (कवियों के लिए )
8 . "दुनिया के भीड़ में था तू अकेला
पर कारवां बनता चला गया ,
नामुमकिन भी मुमकीन बनता चला गया...............
न किया वार तलवार से ,
पर तेरा कलम कम न था किसी हथियार से
तेरी ही बातों से गुमराहो का
रास्ता बनता चला.....................
नजरवालों को नया
नजरिया मिलता चला गया
था तो...... तू अकेला ही
पर कारंवा बनता चला गया .........."
 





(अर्चना चतुर्वेदी )

Saturday, 12 May 2012

माँ का ख़त-(मदर्स डे पर विशेष )
                                                       कैसे मैं तुम्हे पढ़ा दूँ ........

माँ का खत है ये मेरे दोस्तों 
कैसे मैं तुम्हे पढ़ा दूँ !
इस आइने में जो तस्वीर है 
कैसे मैं तुम्हे दिखा दूँ !...........

अपनी तस्वीर को आँखों से 
तो सभी लगाते  है  
बनी मेरी तकदीर जिस तस्वीर से 
वो सूरत तुम्हे कैसे दिखा दूँ !.......

कैसे दिखा दूँ ...?

बिना काजर की वो आँखे 
जो खुलते ही सवेरा ..
झपकते ही शाम 
कर देती है...............
न जाने कितनी तलब हैं 
हमारी आहट की उसको 
जिसे देखते ही वो सुकून 
की साँस भर  लेती है  ....

कई बार रो-रो कर हमने,
उसके आँचल को भिगोया 
पर न जाने उसने किस अंदाज़ से 
हर बार अपने आंसुओ को हमसे छुपाया 

इन अनमोल आंसुओं के मोल को 
इस खत में कैसे बता दूँ !.......

ऐ  दोस्त अब तू ही बता 
ये खत मैं तुम्हे कैसे पढ़ा दूँ !.....

अपनी चाहत को न देखा न उसने 
हमारी  हर चाहत के आगे 
बस हमारे चेहरों पे  खिली हंसी से ...
ख़ुशी मिलती थी उसको...........

हिम्मत तो न थी वो 
बोल सके कुछ घर पे ....
पर सदा हमारे नए फैसलों 
के लिए आवाज़ उठाई उसने ...

कम खा के हमारे लिए 
रोटिया बचाई जिसने ...
हमारी ही गलतियो के लिए 
गालियाँ खाई जिसने ............

उस ममता की मूर्ति की 
त्याग कहानी ...........
मैं यूँ ....... ही
कैसे लिख दूँ !...

ऐ  दोस्त अब तू ही बता 
ये खत मैं तुम्हे कैसे पढ़ा दूँ !.....

इस ख़त में मेरी माँ  के हांथो 
का वो एहसास हैं .......
जिसने कभी दर्द से करहाते 
शारीर को छु कर ......... 
दवा का काम किया था ।

इस ख़त में उस थप्पड़ 
की गूंज हैं ......
जिसे मार कर माँ ने 
मुझे उससे भी जायदा 
प्यार किया था !.......

ऐ बचपन तू काश !
वही रुक जाता.....
जंहा मेरी माँ के आँचल से 
मेरा सर ढक जाता .....
उनकी गोद में सर रखकर 
मैं सुकून की नींद सो जाता ..

काश! माँ तेरे संग वो पल वाही रुक जाता ।
माँ के संग बिताये ......
हर लम्हे , हर एहसास को 
इन चंद शब्दों से 
कैसे सजा दूँ !..........  


ऐ  दोस्त अब तू ही बता 
ये खत मैं तुम्हे कैसे पढ़ा दूँ !....

"तू पढ़ेगा इस खत को 
तो रोयेगा तू भी ....
क्योकि तेरी भी माँ होंगी 
मेरी माँ के जैसी .......
जिसके  होंठो  पे कभी 
हमारे लिए बददुआ न होगी 
ऐ दोस्त वो "माँ" ही हैं 
जो हमसे कभी खफा नहीं होगी "

 (अर्चना चतुर्वेदी )

Friday, 6 April 2012

बचपन के खेल : कुछ इस तरह याद आये

"आज बचपन के खेल कुछ इस तरह याद आये ,
जब टूटे हुए खिलौने कबाड़ो में नज़र आये " 
                                                              हाय ......................... वो बचपन के दिन भी क्या दिन थे , चाहत चाँद को पाने की करते थे और दोपहर से  शाम तक  कभी बुलबुल कभी तितली को पकड़ा करते . न दिन का  होश न शाम की खबर न  ही सुध - बुध कपड़ो की और न ही अपनी .  कभी मिट्टी पे हम तो कभी मिट्टी हमारे चेहरों को छूती ,कभी हाथो पे  तो कभी कपड़ो पे याद है न कैसे लग जाया करती थी . सुबह की वो प्यारी मीठी नींद से जब हमे जबरदस्ती जगाया जाता .. वो भी स्कूल जाने के लिए. कितना गुस्सा आता था न  .......थक - हार  के स्कूल से आते  पर तुरंत ही खेलने के लिए तैयार भी हो जाते . वो बचपन के सारे खेल हमे कितना कुछ सिखाते थे , कभी आपस में लड़ाते तो कभी साथ मिलके मुस्कुराते . अपनी बचकानी हरकतों से हम दुसरो को कितना सताते थे न . वो .....बहती नाक , खिसकती निक्कर तो याद ही होगी ...जब हम दोस्तों से कहते " अले लुतो तो अम भी थेलने आ लए है "आइये फिर डूबते हैं इन कुछ बचपन के खेलो और शरारत भरी यादो में ............................

आज वक्त के इस आइने में हमारे कल की तस्वीर चाहे कितनी ही पुरानी हो गई हो पर जब भी सामने आती है ढेर सारी यादे ताज़ा हो जाती हैं और वो भी यादे अगर बचपन की हो तो और ही मज़ा आता है .......जैसे -"अक्कड़ -बक्कड़  बम्बे बो, अस्सी नब्बे पुरे सौ , सौ में लगा धागा, चोर निकल के भागा" ये लाइने तो याद ही होगी और "पौसम्म पा भाई पौसम्म पा"  इन शब्दों के बिना हमारे सारे खेल अधूरे हुआ करते थे . स्कूल से चौंक चुरा - चुरा कर लाई जाती थी याद है किसलिए ? अरे हा! हा! खाने के इलावा ................नहीं याद आया अरे!!!!! "सिक्कड़ी" बनाने के लिए , खासतौर लडकिय बड़ी माहिर होती थी इस खेल में . और "पहाड़ - पानी " याद है ? नहीं.........? मेरा कहने का मतलब "बर्फ - पानी" अब याद आया .............और कितना दौड़ा करते थे और कदम थे की एक जगह कभी रुकते ही नहीं थे . "छुपन - छुपाई..ई ..ई..ई..ई " ,आइस -पाईस बोलने में कितना मजा आता था .

 उस टाइम हमे कितना उधमी कहा जाता था वो साहसी वाला नहीं ..........जी! "उधम " (शोरशराबा / हलचल ) मचाने वाला . पर हमको इस बात की कहा फ़िक्र रहती थी आखिर मनमौजी जो थे . अपने पसंद के रंग की कितनी पंतगे उड़ाई है  हमने , न पंतगो के कटने का सिलसिला रुकता था और न ही हमारे नई पतंगो के उड़ने का . हार नहीं मानते थे जब तक एक पतंग काट न ले शायद  उस समय ये पतंग का खेल हमे बताने की कोशिश करता था की उम्मीद की डोर भले ही कट जाए पर कभी हार मत मानना .फिर पता नहीं आज हम छोटी - छोटी असफलताओ को अपनी हार क्यों मान लेते हैं ? शायद ....समझ की कमी से ......पर समझ तो सही मायने में हमे बचपन में ही नहीं थी फिर भी हर खतरों के खेल से मुस्कुराते हुए खेल जाते थे . क्रिकेट खेलना हो तो तैयारी एक दिन पहले से ही शुरू हो जाती, जिसका बैट होता पहली बारी भी उसी की होती और जब बेमतलब के चौके - छक्के लगते न.... कहने का मतलब जब हमारी गेंद पड़ोसियों के घरो में चली जाती और हम " प्लीज़ आंटी ..........आखिरी बार अब नहीं जाएगी गेंद आपके घर में प्लीज़ आंटी " हमारा मासूम चेहरा देख हमे वापस कर दी जाती.

कितनी बार अपने सपनो का घर बनाते तो कभी गुड्डे - गुडियों की शादी करते ,कभी लडकियों की चोटी खींचते और उन्हें परेशान करते उस पर पापा की वो डांटे और वो गलती पर मम्मी को मनाना होता था , कभी बारिश में कागज़ की नाव बहाए तो कभी राह चलते पानी में बेमतलब पैर छप-छपाए .जब याद करते है उन पालो को तो किशोर कुमार का वो गीत याद आता है -"कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन " पर सच कहूँ तो मुश्किल ही लगता है उन दिनों का लौट पाना ...."काश ! कही बैंक होता अपने बचपन का तो....... वो पुरानी यादे वो लम्हे निकाल लाते "

 बचपन में न जाने कैसे - कैसे खेल खेला करते थे और अब समय की व्यस्थता के चलते जिन्दगी हमारे साथ बड़े अजीब -अजीब खेल खेलती है कल तक गुड्डे - गुडियों को हम अपने इशारो पे नाचते थे और आज जिन्दगी हमे .जब हम "उच-नीच" का खेल खेलते थे तब हमे किसी ने बताया नहीं था की ये है क्या हैं? अपने हिसाब से हमने आपने मानक तय कर लिए थे और आज इस के मायने ही बदल गये है अब न ही गलियों में वो शोर सुनाई देता है और न ही पार्को में बच्चे . अब न ही आगनों में सिकड़ी बनी होती है और न ही गिल्ली डंडे के खेल का शोर ......क्योकि अब इन्हें हम में से किसी समझदार ने status simble में बांध दिया है अब कहा जाता है की ये सब खेल शरीफ घर के बच्चे नहीं खेला करते जादातर तो अब बच्चे घर में कैद हो जाते है या तो टी.वी के सामने , विडियो गेम में या कंप्यूटर और या फिर इन्टरनेट पे ....उनकी मासूमियत किसी और ने नहीं हमने ही छीनी है जिसकी वजह से हमारे ये बचपन के खेल अब जल्द ही  सिर्फ कुछ इतिहासों के पन्ने बन जायेगे ...सच कहूँ तो आज का बचपन कही खोता हुआ नज़र आ रहा है समय से पहले ही  बच्चे बड़े हो जाते है एक तरह से तो अच्छा है की उनका विकास हो रहा है पर शायद  वो अपने जीवन के उन सुनहरे पलो को नहीं  जी पा रहे है जो अपने और हमने जिए है इसी वजह से वो अकेलेपन का शिकार हो रहे है .....स्कूल के बैग का बोझ दिन पर दिन बढता जा रहा है और बच्चे धीरे - धीरे दबते जा रहे है . जरूरत है हमे उन्हें हकीकत की दुनिया से रूबरू करने की .जिससे वो अपने आज को खुल के जी सके और आने वाले कल में ये कह सके की .........
"बचपन का भी क्या ज़माना था 
हँसता मुस्कुराता  खुशियो का खज़ाना था 
खबर न थी सुबह की न शाम का ठिकाना था 
दादा  दादी की कहानी थी परियो का फ़साना था 
गम की कोई जुबान न थी सिर्फ हसने का बहाना था, अब रही न वो जिन्दगी जैसे बचपन का जमाना था "