बस एक रात की बात


पने देखना किसे अच्छा नहीं लगता लेकिन उन्हें पूरा करना हर किसी के बस की बात नहीं होती। पर कोशिश हर कोई करता है। बस इसके लिए कोई सही राह चुनता है तो कोई गलत रास्ते पर चल देता है। लेकिन मंजिल किसे मिलनी ही ये उनका संघर्ष ही बताता है। ऐसे ही दो सपने पल रहे थे गाजियाबाद शहर में।

प्रवीण और रश्मी, अब तक दोनों एक दूसरे से अन्जान काम की तलाश में भटक रहे थे। प्रवीण एक पढ़े-लिखे परिवार से था। मां सरकारी स्कूल में टीचर थी और पिता जी बैंक कर्मचारी। परिवार में सिर्फ तीन ही प्राणी थे। प्रवीण का सपना था कि वो एक फाइव स्टार होटल का मैनेजर बन जाए और फिर धीरे-धीरे वो एक खुद का एक होटल खोल ले। बस इसी ख्वाहिश को संजोए वो दिन-रात नौकरी तलाशने में लगा हुआ था।

वहां दूसरी तरफ रश्मी भी कई दफ्तरों के चक्कर काट चुकी थी। लेकिन कहीं भी उसे आशा किरण न दिखी। रश्मी थी तो बनारस की लेकिन गाजियाबाद में अपनी दीदी और जीजा जी के साथ रहती थी। वह ट्रेफिक पुलिस इंस्पेक्टर थे। शादी को 10 साल हो गए थे। लेकिन अब तक कोई औलाद न थी। जिसकी वजह से वह आए दिन नशा करते और देर रात घर आया करते। रश्मी को अब यह सब अजीब नहीं लगता था। वह उनकी इस आदत से वाकिफ हो गई थी। रश्मी का सपना फैशन डिजाइनर बनने का था। और वो इसके लिए लगातार कोशिश कर रही थी।

11 मई का दिन भी बड़ा अजीब था। प्रवीण को एक फाइव स्टार होटल से इंटरव्यू के लिए कॉल आया था और उसी दिन रश्मी को भी एक बहुत बड़े ब्रांड से ऑफर आया था मिलने का। दोनों को ही अगले दिन सुबह 11 बजे दिल्ली पहुंचना था। फिर क्या था सपनों को पूरा करने के लिए दोनों ने अपने पंखों को हौसला दिया और उड़ने की तैयारी करने लगे। उस रात नींद तो आई नहीं बस सपनों की दुनिया में दोनों गोते लगाते रहे। इस बात से अंजान कि अगली सुबह इनकी जिंदगी में एक नया पन्ना लिखने वाली है।

मई की चिलचिलाती धूप में निकल पड़े दोनों अपना बस्ता उठा के। ऐसा लग रहा था कि दोनों आज की जंग में फतह हासिल कर के ही घर लौटेंगे। मैट्रों में चेकिंग के लिए दोनों ने अपना काले रंग का बस्ता मशीन में डाला। रश्मी और प्रवीण दोनों एक दूसरे से मिलते कि इससे पहले ही मशीन में इनके बस्ते आपस में मिल गए। मजेदार बात यह थी कि दोनों के बस्ते एक ही रंग और ब्रांड के थे। ... अजीब था लेकिन ये तो होना ही था। दोनों ने अपनी-अपनी मेट्रो पकड़ी और चल दिए किला-फतह करने।

इंटरव्यू के वक्त जब रश्मी ने अपने सार्टीफिकेट निकालने के लिए बस्ता खोला तो वह भौचक्की रह गई। मानो उसके पांव से जमीन ही खिसक गई हो..

ये क्या प्रवीण अवस्थी अब ये बला कौन है जिसने आज मेरे अरमानों पर पानी फेर दिया। - बस्ते के अंदर मिले सार्टिफिकेट को देखकर रश्मी बोली।

वहां दूसरी तरफ जब प्रवीण ने बस्ता खोला तो वो भी हक्का-बक्का रह गया। बस्ते में रश्मी के सार्टिफिकेट पड़े देखकर। दोनों को यह बात समझ आ गई कि जरूर मेट्रो में चेकिंग के दौरान यह कयामत हुई है। खैर दोनों ने बिना सर्टिफेकट के अपना-अपना इंटरव्यू दिया और घर की ओर चल दिए।

प्रवीण ने इस बस्ते के मालिक को खोजने के लिए समान की तलाशी ली। जब भी बस्ते में हाथ डालता तो कभी नेलपॉलिश, कभी लिपस्टिक तो कभी झुमके न जाने क्या-क्या उसके हाथों में आ जाता। फिर अचानक उसे एक आईडी कार्ड मिलता है जिसमें रश्मी की फोटो होती है। प्रवीण की आँखें बस वही ठहर जाती है मानो उसे उसकी मंजिल अब मिल गई हो। ऐसी सुंदरी को देख प्रवीण को अपनी प्रेम की तलाश पूरी होती नजर आ रही थी। कार्ड को पलट कर देखा तो उसमें मोबाइल नंबर भी दिया था। उसने तुरंत अपना फोन निकाला और नंबर मिला दिया। तभी दूसरी तरफ से आवाज आई

हैलो.........  !

आवाज सुनते ही प्रवीण अपने होश खो बैठा.. और उसके मुंह से अवाज तक न निकल पाई। फिर क्या था फोन कट गया। प्रवीण ने हिम्मत करके दुबारा फोन किया।

प्रवीण- हैलो रश्मी....

रश्मी – हां जी बताइए मैं बोल रही हूँ..

प्रवीण- जी वो... जी........ मैं........ जी.. आप का..... जी मेरा...

रश्मी – ओह..... लगता है आप प्रवीण बोल रहे हो!

ये क्या.... रश्मी के मुंह से अचानक ये सुनकर प्रवीण चौंक गया और घबरा कर बोला जी मैं प्रवीण ही बोल रहा हूँ.. माफी चाहूँगा मेरा बस्ता आपके बस्ते से बदल गया है।

रश्मी- जी माफी किस बात की गलती हमारी नहीं बस्ते की है..

प्रवीण मुस्कुराते हुए बोला—अच्छा जी बताइए आप कहाँ हैं? मैं आकर आपका बस्ता लौटा देता हूँ।

रश्मी ने झिझकते हुए कहां आप ऐसा करिए उसी मेट्रो स्टेशन में मिलिए जहां हमारा बस्ता बदला था मैं वहीं मिलूँगी आपको।

रश्मी की बात सुनकर प्रवीण का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। ऐसा उसके साथ इससे पहले कभी नहीं हुआ था। रास्ता कहीं जा रहा था और उसके पैर कहीं और....

शाम के चार बज रहे थे रश्मी मेट्रो स्टेशन पर टिकट खिड़की के बाहर प्रवीण का इंतजार कर रही थी और सोच रही थी कि कैसा होगा दिखने में ये लड़का... कही आजकल के लड़कों की तरह चालू किस्म का तो नहीं होगा, कही फरेबी हुआ तो..... तो क्या मुझे कौन सा उससे शादी करनी है। बस अपना बस्ता लेना है और उसका बस्ता उसे वापस करना है... घबराहट की वजह से रश्मी अपने मन ही मन में बड़बड़ाए जा रही थी....

तभी अचानक पीछे से आवाज आई ... रश्मी....जी....

प्रवीण की आवाज डर के कारण लड़खड़ा रही थी।

रश्मी ने पलट कर देखा तो एक लम्बा-चौड़ा कद-काठी का लड़का उसे बुला रहा था। उसे देखती ही रश्मी के मुंह से निकल पड़ा ... हाय कितना हैंडसम लड़का है ये...

दोनों एक दूसरे को बस निहारे जा रहे थे। बस्ता बदलना तो एक बहाना था किस्मत ने इन दोनों को जो मिलाना था। बिना कुछ कहे बिना कुछ पूछे दोनों ने एक-दूसरे से बस्ते बदले और चल दिए अपने-अपने रास्ते की ओर।

इस रात भी दोनों को नींद नहीं प्रवीण रश्मी के बारे में सोचता और वो प्रवीण के बारे में। रात करवट बदलने में ही कट गई। रश्मी सुबह जब उठी तो देखा दीदी दरवाजे पर गिरी पड़ी हुई थी। वह घबरा गई और भागकर दीदी को उठाने गई, देखा तो उनके सर से खून निकल रहा था। 

रश्मी ने छट से मेडिकल किट निकाला और जख्म पर दवा लगा कर मलहम पट्टी कर दी। दीदी को किसी तरह सहारा देकर उसने बेड पर लेटाया। वह बेहोश थी। रश्मी भागकर दूसरे कमरे में गई अपने जीजा जी को उठाने लेकिन वो वहां पर नहीं थे। तभी दीदी को होश आ गया। रश्मी ने पानी पिलाया और पूछा ये सब कैसा हुआ और जीजा जी कहां हैं कहीं उन्होंने ही तो तुम्हें ......? 

तब दीदी रश्मी के सामने फफक-फफक कर रो पड़ी। और कहने लगी-  मैं नहीं रह सकती हूं उस जालिम के साथ रश्मी ..... जल्लाद है वो मार डालेगा वो मुझे ... ले चलो मुझे यहां से दूर कहीं.. नहीं रहना ऐसे पति के साथ मुझे जो बोलते बाद में है और हाथ पहले चलाते हैं ....

रश्मी यह सब सुनकर हैरान हो गई। आखिर दीदी ऐसा क्यों कह रही हैं। तभी अचानक रश्मी को जीजा जी के आने की आहट लगती है। दरवाजे पर देखती है कि वह अकेले नहीं बल्कि एक पराई औरत के गले में हाथ डाले शराब के नशे में अंदर आते हैं... रश्मी ये सब देखकर डर जाती है।
ये सब क्या है जीजा जी और ये औरत कौन है आपके साथ ? – घबराते हुए पूछती है रश्मी

ये मेरी मधू है मधू... मैंने इससे शादी कर ली है.. और अब तू और तेरी दीदी दोनों यहां से निकल लो.. चले जाओं इस घर से समझी... चलो निकलो यहाँ से .. रश्मी पर चिल्लाते हुए उसके जीजा ने जवाब दिया।
रश्मी कुछ कहती इससे पहले उसकी दीदी ने उसका हाथ पकड़ा और सामान उठाकर उसे बाहर ले आई।

तुझे मेरी कसम है रश्मी चल यहां से कही दूर। नहीं रहना मुझे इस किस्म के इंसान के साथ... चल रश्मी चल.... मैं तेरे हाथ जोड़ती हूँ पैर पड़ती हूँ...  दीदी ने रश्मी से कहा।

रश्मी ने अपनी दीदी के आंसू पोंछे और उन्हें लेकर घर से बाहर आ गई। मन में बस यही सवाल उठ रहे थे कि वे अब जाए कहाँ...पहले मन में आया कि बनारस चले जाते हैं लेकिन वहां रिश्तेदार दस तरह की बातें बनाऐंगे.. दीदी का जीना दुस्बार कर देंगे। करूं तो क्या करूं कुछ समझ नहीं आ रहा।

उन्होंने बस पकड़ी और वो कश्मीरी गेट बस अड्डा पहुंच गए। कुछ दूर चलते-चलते उन्हें एक घर दिखा। जिसपर किराये के लिए खाली है का बोर्ड लगा था। रश्मी ने घर का दरवाजा खटखटाया.. 70 वर्षीय एक बुजुर्ग महिला बाहर निकली और पूछने लगी किससे मिलना है।
रश्मी ने कहा-  किराए पर कमरा चाहिए था...

महिला ने कहा- हां खाली है 2 हजार रूपया महीना किराया है।

घर की हालत खस्ता हो रखी थी पर रश्मी के पास और कोई ठिकाना नहीं था। दीदी की तबियत बिगड़ती जा रही थी। उसने झट से हां कर दी। पैसा महिला के हाथ में थमाते हुए रश्मी ने सामान उठाया और कमरा का ताला खोला.. अंदर से मकान और भी ज्यादा बुरे हाल में था... दीवारों पर सीलन, जगह-जगह से फर्श टूटी हुई ... । लेकिन रश्मी को अपनी मुसीबत के आगे ये सब राई समान लग रहा था।

रश्मी की यह रात सिर्फ भीगी पलकों में ही कट गई। अगले दिन सुबह मोबाइल पर प्रवीण की मिस्ड कॉल देखकर रश्मी न तो खुश हो पा रही थी और न ही नाराज। प्रवीण को लगा कि शायद उसकी इस हरकत से रश्मी को परेशानी हुई होगी, इसी कारण उसने अब तक कोई जवाब नहीं दिया। रश्मी के गम से अंजान प्रवीण ने उसे एक एसएमएस भेजा। उसमें लिखा था-

सॉरी रश्मी मैंने सुबह तुम्हें कॉल किया था। मेरा मन था तुमसे बात करने को। पता नहीं क्यों पर मैं अपने आप को रोक नहीं पाया। अगर तुम्हें बुरा न लगे तो प्लीज कल शाम चार बजे तुम मुझसे वहीं पर मिलो आके जहां हम पहले मिले थे।

तभी

टूं...टूं...टूंटट – फोन पर एसएमएस आता है।

रश्मी ने देखा और कहा- अरे प्रवीण का एसएमएस... पर क्यों ?

एसएमएस पढ़ते ही रश्मी एक पल के लिए सारे गम भूल जाती है.. और प्रवीण के बारे में मन ही मन सोचने लगती है- उसका क्या कसूर है.. वो तो मुझसे मिलना चाहता है.. क्या पता मैं उसे पंसद आ गई हूं.. कितना अच्छा लड़का.. कितनी भोली सूरत है.. मैं भी तो मिलना चाहती हूं उससे। पर .... दीदी... उनको तो अभी मेरी ज्यादा जरूरत है ... नौकरी नहीं मिली तो घर खर्च कैसे चलेगा... क्या होगा..कैसे होगा..?

अगले ही दिन रश्मी बस्ता उठाती है और काम के तलाश में निकल पड़ती है.. सुबह से शाम हो जाती है पर निराशा रश्मी का साथ छोड़ने के लिए तैयार नहीं होती। वहीं प्रवीण को उस फाइव स्टार होटल से ज्वाइनिंग लेटर मिल जाता है जहां उसने इंटरव्यू दिया था। वह बुहत खुश होता है। वह रश्मी को मिलकर उसे बधाई देना चाहता है। और ये बताना चाहता है कि वो तुम ही हो रश्मी जिसने मुझे मेरी मंजिल से मिलवाया है।

शाम के चार बजते है प्रवीण गुलाब का फूल और मिठाई लिए मेट्रो स्टेशन पर रश्मी का इंतजार कर रहा होता है तभी वह देखता है कि रश्मी उसकी तरफ न देखकर सीधे गेट से बाहर जा रही है। प्रवीण उसके पीछे भागता है और आवाज देता है रश्मी .... रश्मी रूको....।

रश्मी ठहर जाती है। और कहती है अरे प्रवीण आप ... मैं भूल गई थी। वो आज...
-          रश्मी बात पूरी नहीं कर पाती कि प्रवीण उसे बताने लगता है – रश्मी जी आज मैं बहुत खुश हूँ और खुशी का कारण सिर्फ आप हो सिर्फ आप... पता है मुझे एक फाइव स्टार होटल में मैनेजर पोस्ट के लिए जॉब मिल गई। वो भी आपकी लक की वजह से...
रश्मी ने पूछा- जी बहुत-बहुत बधाई हो आपको..... पर इसमें मैंने कुछ नहीं किया है।

प्रवीण कहता है – अरे आप का बस्ता उस दिन मेरे साथ था न इसलिए ये जॉब मुझे मिल गई । आपका बस्ता इतना लकी है मेरी लिए तो आप मेरे लिए कितनी लकी होगी। इसका अंदाजा में लगा सकता हूँ।

बातों ही बातों में प्रवीण ने रश्मी को आई लव यू कह दिया। रश्मी ये सब सुनकर ठगी सी खड़ी रह गई। उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि मुसीबत के समय इन खुशियों का स्वागत वो कैसे करे।

रश्मी ने प्रवीण की ओर देखा और उसे गले लगा लिया। और वहां से चली गई।

प्रवीण को लगा कि रश्मी शर्माकर चली गई। लड़की है न इतनी जल्दी यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं कर सकती ।

समय धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा था। रश्मी और प्रवीण दोनों का प्यार अब परवान चढ़ने लगा था। दोनों एक-दूसरे से घंटों बात किया करते। लेकिन रश्मी ने अब तक प्रवीण को अपने बारे में कुछ भी नहीं बताया था कि वह इस समय किन परेशानियों से जूझ रही है।

रश्मी की दीदी को टी.बी हो गया था। घर का खर्चा तो चल नहीं पा रहा था साथ ही अब दवाईयों का खर्च भी। 

रश्मी ने 5 हजार रूपए महीने पर एक कपड़े की दुकान पर काम करना शुरू कर दिया। वह दुकान पर ग्राहकों को कपड़े दिखाती थी। फैशन डिजाइनर बनने का सपना मानो उसे अब सपना ही लगने लगा था। इन पैसों से घर का खर्च चल ही नहीं पा रहा था। दीदी की तबियत इतनी बिगड़ गई कि उसे अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। पैसे के नाम पर रश्मी के पास सिर्फ 500 रुपया था। और कुछ नहीं। वह मदद के लिए अपनी दुकान पर गई उसने मालिक को बताया कि उसे 20 हजार रूपयों की जरूरत है। मालिक ने देने से इंकार कर दिए।

निराश रश्मी कोने में बैठकर रोने लगी। तभी उसी दुकान पर काम करने वाली प्रिया ने रश्मी से कहा एक इंसान है जो तुम्हारी मदद कर सकता है। चलो मेरे साथ मैं तुम्हें उसके पास ले चलती हूँ। मदद की आस लिए वह प्रिया के साथ झट से चल पड़ी। ये भी नहीं पूछा कौन है कहां रहता है... कुछ नहीं बस चल पड़ी।

कुछ अजीब सा महौल था उस जगह का। न जाने क्यों रश्मी को डर नहीं लग रहा था। उसे बस उसकी दीदी नजर आ रही थी। प्रिया उसे एक बड़े से आलीशान बंगले में ले गई। अंदर एक सेठ जी बैठे थे प्रिया ने रश्मी से कहां ये हैं हमारे सेठ जी सबकी मदद करते हैं। बहुत अच्छे इंसान हैं तुम्हारी भी सारी परेशानी हल कर देंगे। अपनी बात इनकी सामने रखो तो।

सेठ जी ने रश्मी से कहा घबरा क्यों रही लड़की... खुल के बात करो.. क्या समस्या है तुम्हें..

रश्मी ने अपना पूरा हाल सेठ जी को कह सुनाया। बोली – अभी 20 हजार रुपयों की जरूरत है इलाज के लिए जमा करने हैं.. मदद कीजिए।
सेठ जी ने रश्मी को काम के बारे में बताया। और कहाँ ये काम करके तुम एक बार में ही 5 हजार रुपए कमा सकती हो। यदि ये काम तुम रोज करोगी तो शायद तुम्हारी अच्छी कमाई हो जाए। और फिर ये क्लाइंट के ऊपर निर्भर करता है कि वह खुश होकर तुम्हें कितना भी दे दे। रश्मी को ये काम अटपटा जरूर लगा लेकिन मुसीबत से निपटने के लिए वो कुछ भी करने को तैयार थी वो इस काम के लिए मान गई।

सेठ जी ने उससे कहा बस एक रात की बात है होटल फाइव स्टार पहुँच जाना तुम्हें वहाँ हमारा आदमी मिल जाएगा जो तुम्हें क्लाइंट के कमरे तक पहुंचा देगा। और सुबह जब तुम वहां से निकलना तो हमारे आदमी को 500 सौ या हजार रुपए दे देना और चली जाना। और अगर तुम्हें ये काम करने में कोई झिझक नहीं है तो हम तुम्हें क्लाइंट के सीधे बंगले पर भेज दिया करेंगे। इसके लिए कभी-कभी तुम्हें दूसरे शहर या दूसरे देश भी जाना पड़ सकता है।

रश्मी ने दिल पर पत्थर रखकर सेठ जी को हां कह दिया और वहां से चली गई। उसे डर था कहीं किसी ने भी देर रात होटल में उसे देख लिया तो बदनामी का दाग उस पर सदा के लिए लग जाएगा।

वही दूसरी तरफ रश्मी की तकलीफों से अंजान प्रवीण अपने काम में व्यस्त था। वह दिन में पढ़ाई करता और रात की शिफ्ट में होटल में मन लगा कर काम करता था। वह जल्द ही रश्मी के सामने शादी का प्रस्ताव भी रखने वाला था। लेकिन उसे पता नहीं था कि आज की रात उसके अरमानों को काला कर देगी।

रात के नौ बज रहे थे प्रवीण होटल के राउण्ड पर था। वह देखता है कि एक लड़की जो अपना मुंह रुपट्टे से ढके हुए है.. वो किसी को ढूँढ रही है। तभी वो एक आदमी से मिली। उसने उस लड़की से रूपट्टा हटाने को कहा। जैसे ही लड़की ने अपने चेहरे पर पड़े पर्दे को हटाया .. प्रवीण चौंक गया.... ये क्या ये तो रश्मी है... इतनी रात गए होटल में और ये आदमी कौन है इसके साथ....

तभी वो दोनों लिफ्ट में चले गए.. उन्हें चौथे मंजिले पर जाना था।
प्रवीण भी उनके पीछे-पीछे चला गया। डरा, सहमा हुआ कॉप रहा था वह एकदम। मन ही मन सोच रहा था रश्मी कभी ऐसा नहीं कर सकती।

उस आदमी ने चुपके से एक थैली दी और रश्मी ने झट से उसे पर्स के अंदर रख लिया। वह लोग कमरा नंबर 111 के बाहर खड़े थे। रश्मी के चेहरे पर पसीना आ रहा था वह घबरा रही थी। उसने दरवाजे को खटखटाया .... दरवाजा खुला और रश्मी अंदर चली गई।

प्रवीण का मन हुआ की वह कमरे में जाए और रश्मी से पूछे की उसने उसके साथ इनता बड़ा धोखा क्यों किया। क्यों खेला उसकी जिंदगी से... प्रवीण के आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। होटल स्टाफ के लोग भी रश्मी को लेकर तरह-तरह की बातें कर रहे थे। फब्तियां कस रहे थे। प्रवीण बेसुध होकर वहीं कमरे सामने सीढ़ियों पर रात भर बैठा रहा और रोता रहा.....

सुबह पांच बजे कमरा नंबर 111 का दरवाजा खुला... रश्मी कमरे से बाहर निकली। तभी पीछे एक 60 साल का आदमी भी कमरे से निकला उसने रश्मी के माथे को चूमा और उसे 7 हजार रुपए दिए। प्रवीण बस देखता रहा और कुछ न कह सका। वह सोच भी नहीं सकता था कि रश्मी जैसी लड़की के चरित्र में खोट भी होगी। पैसे के लिए वो इस हद तक गिर जाएगी।

रश्मी ने उन्हीं पैसे में से कुछ रुपए सेठ जी द्वारा भेजे गए उस आदमी को दिए और वहां से चली गई। प्रवीण ने चाह कर भी रश्मी को नहीं रोका। उसका मन भी अब रश्मी से नफरत करने लगा था। उसे घिन आ रही थी अपने आप से कि वह ऐसी लड़की से मोहब्बत करता था जो पहले से ही बेवफा थी।

प्रवीण का दिल टूट चुका था। उसका मन नहीं माना और वह रश्मी के बारे में जानने के लिए कमरा नम्बर 111 के अंदर चला गया। वह आदमी बेड पर लेटा हुआ था। प्रवीण को देखते ही उठ गया बोला जी मैनेजर साहब बताइए क्या चाहिए कुछ काम है क्या ?.....

प्रवीण ने घबराते हुए पूछा ये लड़की जो अभी यहां से निकली है वो कल पूरी रात यही थी आपके साथ क्या...?

क्लाइंट ने कहा- क्या तुम रश्मी के बारे में बात कर रहे हो?

प्रवीण ने कहा- हां मैं उसके बारे में ही बात कर रहा हूँ।

क्लाइंट ने कहा- हां बेटा यही थी, बड़ी प्यारी बच्ची है, बहुत आराम से प्यार से उसने मेरे सारे दर्द दूर कर दिए।

प्रवीण का मन हुआ कि वो यही इस आदमी के थप्पड़ जड़ दे ... एक तरफ बच्ची कह रह है और दूसरी तरफ बदमीजी कर रहा है। बात को आगे बढ़ाते हुए उसने पूछा क्या रश्मी इस धंधे में पहले से है.... या फिर अभी आईं है?

क्लाइंट ने कहा-  नहीं नहीं बेटा पहले से नहीं है अभी आई है बेचारी... गमों की मारी है... दीदी के ईलाज के लिए पैसे चाहिए थे उसे इसीलिए लोगों का कोढ़ साफ कर रही है।

प्रवीण ये सुनकर हैरान हो गया ... और कहा क्या कहा आपने कोढ़ साफ करती है।

क्लाइंट ने कहा-  हां बेटा कोढ़ साफ करती है। हम जैसे कोढ़ियों के... परिवार वालों को नहीं बता सकते हम इसलिए होटल में रूम लेते है और एक ऑर्गनाइजेशन है जो इसकी थैरेपी करती है .. उनके लोग आते है और वो आयुर्वेदिक तरीके से लेप लगाकर थैरिपी देते हैं जो कि 6 से 7 घंटे चलती है।

ये सुनकर प्रवीण को अपने ऊपर गुस्सा भी आ रहा था और खुशी भी हो रही थी कि रश्मी की चरित्र में नहीं उसकी खुद की सोच में खोट थी... 

प्रवीण ने झट से उस आदमी का शुक्रिया किया और रश्मी का पता लेकर अस्पताल पहुँच गया जहां उसकी दीदी का इलाज चल रहा था। रश्मी वहीं पास में खड़ी थी। प्रवीण भागकर उसके पास गया और उसे गले से लगा लिया। सभी लोग ये नजारा देखकर हैरान थे। रश्मी को भी समझ नहीं आ रहा था कि यह सब क्या हो रहा है।

हाथ जोड़कर प्रवीण ने रश्मी से माफी मांगी और कहा – तुम देवी सामान्य हो और मैंने तुम्हे गलत समझा रश्मी । माफ कर दो मुझे । मैं तुम्हारा दोषी हूँ... असल माएने में मैं कोढ़ी हूँ... क्योंकि बिना सोचे-समझे, जानें मैंने तुम्हारे चरित्र का फैसला कर लिया .... तुम्हे गलत समझ लिया .. कोढ़ तो मेरे नजरिए में है... माफ कर दो मुझे ..... रश्मी को बात समझ आ गई उसने प्रवीण के आंसू पोंछे और उसे गले से लगा लिया.....

आज इस बात को 10 दस साल बीत चुके हैं। रश्मी और प्रवीण की शादी हो चुकी है। दोनों मिलकर छुआ-छूत रोग मुक्त संस्था चला रहे हैं। और मद्दगारों की मदद कर रहे हैं। बस एक रात की बात ने ही दोनों की जिदंगी बदल दी । और वो अब औरों की जिंदगी बदल रहे हैं।


By- अर्चना चतुर्वेदी

Comments

  1. समाज में व्याप्त नजरिये से होते हुए आपकी कहानी रिश्तों की गहराई तक जाती ; अच्छा लेखन !!

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

मेरी डायरी की शायरी